खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से पेन-कम्प्यूटर तोड़ रहा है

मक्खन का बदला...Khushdeep

मक्खन गली के नुक्कड़ पर बैठा दो घंटे से मक्खियां मार रहा था..तभी ढक्कन आ गया...

ढक्कन ने नसीहत के अंदाज़ में कहा कि क्यों टाइम बर्बाद कर रहा है...

मक्खन ने तपाक से जवाब दिया..ओए, मुझे ऐसा-वैसा न समझ...मैं बदला ले रहा हूं बदला...

ढक्कन ने पूछा...भई वो कैसे...

मक्खन बोला...मुझे पहले वक्त ने बर्बाद किया, अब मैं वक्त को बर्बाद कर रहा हूं...
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दादाजी की आंखे...Khushdeep

ढक्कन...मेरे दादाजी की उम्र 98 साल की है...और उनकी आंखे बेहद तेज़ हैं...कभी उन्होंने ग्लासेस का इस्तेमाल नहीं किया...
मक्खन...यार ढक्कन, ये तो मैंने सुना था कि कई लोग बिना ग्लास का इस्तेमाल किए सीधे बॉटल से ही खींच जाते हैं...लेकिन इस तरह दारू पीने से आंखे तेज़ हो जाती हैं, ये मैंने पहली बार आज तुझसे सुना...
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ये भारत के केकड़े हैं...Khushdeep

विदेश में किसी जगह तमाम देशों से क्रैब (केकड़े) मंगाकर प्रोसेस किए जा रहे थे...सभी देशों के क्रैब डब्बों में बंद होकर आए थे...लेकिन जो क्रैब भारत से आए थे उनके डब्बों के ढक्कन ही नहीं थे...ये देखकर सुपरवाइजर बड़ा हैरान हुआ...शिकायत करने यूनिट इंचार्ज के पास पहुंचा...कहा, ये भारत की कंपनी ने क्रैब के डब्बे खुले ही क्यों भेज दिए...अगर ये निकल कर भाग जाते तो...यूनिट इंचार्ज ने पूछा...क्या कोई क्रैब भागा...सुपरवाइजर ने कहा...नहीं, सर...
यूनिट इंचार्ज ने कहा... तो फिर तू क्यों हलकान हुए जा रहा है...अरे बेवकूफ ये भारत के केकड़े हैं...ये बाहर नहीं निकल सकते...एक निकलने की कोशिश करेगा...तो बाकी के दस इसकी टांग खींचकर फिर नीचे ले जाएंगे...
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क्या नहीं करा देता नशा...खुशदीप

मक्खन एक पार्टी में यार-दोस्तों के साथ ज़्यादा ही टल्ली हो गया...झूमता...लड़खड़ाता घर आया...

मक्खनी ने दरवाजा खोला...मक्खन ने आधी बंद आंखों से ही देखा और बोला...सॉरी मैडम...लगता है गलत कॉल बेल बजा दी...
मक्खनी पहले से ही भरी बैठी थी...फट पड़ी...बस यही नौबत आनी रह गई थी...नशे में इतनी अक्ल मारी गई कि पत्नी को भी भूल गए...
मक्खन...माफ़ करना बहन, नशा आदमी को बड़े से बड़ा गम भुला देता है...
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किस ऑफ डेथ...खुशदीप

किस के लिए बेचारा इमरान हाशमी मुफ्त में ही बदनाम है...आज मैं आपको बताता हूं किस आफ डेथ के बारे में...

दिल तो है दिल किसी पर भी आ सकता है...तो जनाब एक मुर्गी और सुअर के नैन लड़े...आंखों ही आंखों में इशारा हुआ...बात किस तक आ गई...दोनों ने किस लिया...किस लेते ही दोनों दुनिया को अलविदा कह गए...मुर्गी स्वाइन फ्लू से मर गई और सुअर बर्ड फ्लू से....(इसे कहते हैं किस ऑफ डेथ)

 
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शादी की तीन स्टेज...खुशदीप

शादी की तीन स्टेज :
पहली- "मैड फॉर इच अदर"
दूसरी- "मेड फॉर इच अदर"
तीसरी- "मैड बिकॉज़ ऑफ इच अदर"
(आप कौन सी स्टेज में हैं, बताइएगा ज़रूर)
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बापू गया, बेबे जाने वाली है...खुशदीप

एक एनआरआई साहब भारत से अपने बापू और बेबे (मां) को भी उसी मुल्क में साथ ले गए, जहां उनका बसेरा था...बापू जी की परदेस में मौत हो गई...अब एनआरआई साहब ने बापू के पार्थिव शरीर को फ्लाईट से भारत भेजा...साथ ही भारत में अपने गांव में एक ई-मेल भी कर दिया...
बापू चला गया...हमें किसके आसरे छोड़ गया...अब किस काम का हमारा जीना...मैं बापू की डेड बॉडी फ्लां फ्लां...फ्लाईट से भारत भेज रहा हूं...साथ में वो गिफ्ट हैं जो तुमने मुझे भेजने को कहा था...बापू की डेड बॉडी के नीचे 12 पैक चाकलेट, 10 पैक बबल गम, 8 पैक ड्राई फ्रूट्स हैं...बापू ने जो नाइकी जूते पहने हैं वो हैप्पी के लिए हैं...जो बेसबाल हैट पहना है, वो पिंकी के लिए है...बापू के दोनों हाथों में प्रीतो, बिल्लो के लिए हैंडबैग हैं...बापू ने बच्चों की 6 शर्ट पहनी हुई हैं...बाएं हाथ में हरमीत की अंगूठी है...दोनों कलाइयों पर शम्मी और रम्मी की घड़ियां हैं...अगर कुछ और भेजना है तो बब्बी और रब्बी से पूछ लो... यहां बेबे (मां) की भी तबीयत बहुत खराब है... 
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मक्खन गश खाकर क्यों गिरा...खुशदीप

मक्खनी को पहली डिलीवरी होनी थी...मक्खन दिल्ली में था...मक्खन ने मक्खनी का हाल जानने के लिए मेट्रनिटी होम फोन मिलाया...लेकिन गलती से लाइन क्रिकेट स्टेडियम में मिल गई...
मक्खन ने पूछा...क्या हाल है...

दूसरी तरफ से जो जवाब मिला, उसे सुनकर मक्खन खुद गश खाकर गिर गया...
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दरअसल जवाब मिला...

7 आउट हो गए हैं...उम्मीद है कि लंच तक कुछ और आउट हो जाएंगे...जो पहला आउट हुआ वो डक था...
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वक्त-वक्त की बात है...खुशदीप

मैं घर में बैठा था कि मक्खन बड़े उखड़े अंदाज़ में मेरे पास आया...चेहरे से दुनिया-जहां का दर्द टपक रहा था...आते ही बोला...ओफ्फो...सात साल में कितनी दुनिया बदल गई...


मक्खन को दार्शनिक की तरह बात करते देख मेरा माथा ठनका...मैंने पूछा...ऐसा क्या हो गया मक्खन प्यारे...

मक्खन...क्या हो गया....ये पूछो कि क्या नहीं हो गया...

मैंने कहा...जब बताओगे, तब तो मुझे पता चलेगा कि कौन सा आसमान टूट पड़ा...

मक्खन... अब क्या बताऊं दोस्त...सात साल पहले मैं घर आता था तो मेरी मक्खनी दरवाजे से घुसते ही किस से मेरा वेलकम करती थी और मेरा पपी मुझ पर गुर्राता था...


इसके बाद मक्खन ने ठंडी सांस ली चुप हो कर बैठ गया..

तब तक मेरी जिज्ञासा भी बढ़ गई, मैंने कहा...तो अब ऐसा क्या हो गया...

मक्खन...अब उन दोनों ने रोल बदल लिए हैं...
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कयामत किस दिन...खुशदीप

सब पूछते रहते हैं कि कयामत का दिन कब आएगा, कब आएगा...लो आज के अपने स्लॉग ओवर में आपको बता ही देता हूं...फिर मत पूछना कि हम क्लोरमिंट क्यों खाते हैं....
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टीचर...बच्चों क्या तुम जानते हो कयामत किस दिन आएगी...
एक स्टूडेंट...यस मैम, जब वेलेन्टाइन्स डे और रक्षा बंधन एक ही दिन होंगे...
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बड़े मियां की परेशानी...खुशदीप

एक कवि-सम्मेलन में एक कवि महोदय को बड़े दिनों बाद मंच के ज़रिए क्रांति लाने का मौका मिला था...सो हुजूर आ गए फॉर्म में..दो घंटे तक उन्होंने कविता के नाम पर अपनी थोथी तुकबंदियों से श्रोताओं को अच्छी तरह पका दिया तो एक बुज़ुर्गवार मंच के पास आकर लाठी ठकठकाते हुए इधर से उधर घूमने लगे...मंच से कवि महोदय को ये देखकर बेचैनी हुई...पूछा...बड़े मियां, क्या कोई परेशानी है...बड़े मियां का जवाब था...नहीं जनाब, तुमसे क्या परेशानी...तुम तो हमारे मेहमान हो, इसलिए चालू रहो....मैं तो उसे ढूंढ रहा हूं जिसने तुम्हें यहां आने के लिए न्योता भेजा था...
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पतिभक्त महिला और पति का गला...खुशदीप

एक पतिभक्त महिला मॉल से पति के लिए शर्ट खरीदने गई...सेल्समैन ने महिला से पूछा कि पति के कॉलर का नाप क्या है...महिला ने कहा नाप तो नहीं पता लेकिन मेरे दोनों हाथों में उनकी गर्दन आ जाती है...

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मार्डन बच्चे से पूछो कि उसकी फेवरिट बुक कौन सी है...
जवाब होगा- पिताश्री की चेक-बुक और पास-बुक...


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एक पत्रकार को दुविधा थी कि प्रेमिका से प्रणय-सूत्र में बंधने के लिए कौन से धारदार शब्दों का इस्तेमाल करे जो लीक से पूरी तरह हट कर हों...कई दिनों की कोशिश के बाद पत्रकार महोदय ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया वो ये थे...प्रिय, क्या तुम मुझे अपनी चिता में आग लगाने का अधिकार दोगी...
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एडमिशन की रेस...खुशदीप

खरगोश के बारहवीं में 85 % और कछुए के 70 % नंबर आए. लेकिन दिल्ली यूनिवर्सिटी में कॉलेज में खरगोश को नहीं कछुए को एडमिशन मिला...
पूछो क्यों...
अरे भई स्पोटर्स कोटा भी कोई चीज होती है न... भूल गए बचपन मे कछुए ने खरगोश से रेस जीती थी...
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बॉस की फांस...खुशदीप

मक्खन ऑफिस में था...मक्खन ने देखा कि बॉस ऑफिस में नहीं है...मक्खन ने मौका ताड़ा और बंक मार कर घर पहुंच गया...लेकिन ये क्या...घर के बाहर ही बॉस की गाड़ी खड़ी थी...मक्खन ने दरवाजे से कान लगाकर सुना...अंदर से पत्नी मक्खनी और बॉस के खिलखिला कर हंसने की आवाज़ आ रही थी...मक्खन फौरन ऑफिस के लिए वापस भागा...ऑफिस पहुंच कर मक्खन ने ठंडी सांस ली और बोला...शुक्र है कि आज...
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बॉस ने ऑफिस टाइम में मुझे घर नहीं देख लिया...नहीं तो नौकरी से हाथ धोना पड़ता...
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कुर्सी पे बैठा एक कुत्ता

मक्खन जी को शेरो-शायरी की एबीसी नहीं पता लेकिन एक बार जिद पकड़ ली कि शहर में हो रहा मुशायरा हर हाल में सुनेंगे...बड़ा समझाया कि तुम्हारी सोच का दायरा बड़ा है...ये मुशायरे-वुशायरे उस सोच में फिट नहीं बैठते...लेकिन मक्खन ने सोच लिया तो सोच लिया...नो इफ़, नो बट...ओनली जट..पहुंच गए जी मुशायरा सुनने...मुशायरे में जैसा होता है नामी-गिरामी शायरों के कलाम से पहले लोकल स्वयंभू शायरों को माइक पर मुंह साफ करने का मौका दिया जा रहा था...ऐसे ही एक फन्ने मेरठी ने मोर्चा संभाला और बोलना शुरू किया...कुर्सी पे बैठा एक कुत्ता....पूरे हॉल में खामोशी लेकिन अपने मक्खन जी ने दाद दी...वाह, सुभानअल्ला...आस-प़ड़ोस वालों ने ऐसे देखा जैसे कोई एलियन आसमां से उनके बीच टपक पड़ा हो...उधर फन्ने मेरठी ने अगली लाइन पढ़ी ...कुर्सी पे बैठा कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...हाल में अब भी खामोशी थी लेकिन मक्खन जी अपनी सीट से खड़े हो चुके थे और कहने लगे...भई वाह, वाह, वाह क्या बात है, बहुत खूब..अब तक आस-पास वालों ने मक्खन जी को हिराकत की नज़रों से देखना शुरू कर दिया था...फन्ने मेरठी आगे शुरू...कुर्सी पे कुत्ता, उसके ऊपर कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...ये सुनते ही मक्खनजी तो अपनी सीट पर ही खड़े हो गए और उछलते हुए तब तक वाह-वाह करते रहे जब तक साथ वालों ने हाथ खींचकर नीचे नहीं गिरा दिया...फन्ने मेरठी का कलाम जारी था...कुर्सी पे कुत्ता, उस पर कुत्ता, कुत्ते पर कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...अब तक तो मक्खन जी ने फर्श पर लोट लगाना शुरू कर दिया था...इतनी मस्ती कि मुंह से वाह के शब्द बाहर आने भी मुश्किल हो रहे थे......एक जनाब से आखिर रहा नहीं गया...उन्होंने मक्खन से कड़क अंदाज में कहा... ये किस बात की वाह-वाह लगा रखी है... हैं..मियां ज़रा भी शऊर नहीं है क्या...इतने वाहिआत शेर पर खुद को हलकान कर रखा है...मक्खन ने उसी अंदाज में जवाब दिया...ओए...तू शेर को मार गोली...बस कुत्तों का बैलेंस देख, बैलेंस ,...
 
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मक्खन का बदला

मक्खन गली के नुक्कड़ पर बैठा दो घंटे से मक्खियां मार रहा था..तभी ढक्कन आ गया...ढक्कन ने नसीहत के अंदाज़ में कहा कि क्यों टाइम बर्बाद कर रहा है...मक्खन ने तपाक से जवाब दिया..ओए, मुझे ऐसा-वैसा न समझ...मैं बदला ले रहा हूं बदला...ढक्कन ने पूछा...भई वो कैसे...मक्खन बोला...मुझे पहले वक्त ने बर्बाद किया, अब मैं वक्त को बर्बाद कर रहा हूं...
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मक्खन मासूम...

मेरा एक दोस्त है मक्खन...पिता गैरेज चलाते हैं...अब मक्खन ठहरा मक्खन...रब का बंदा...पढ़ाई मे ढक्कन रहा...कह-कहवा कर नवीं तक तो गाड़ी निकल गई...दसवीं में बोर्ड था तो गाड़ी अटक गई...तीन चार साल झटके खाए...पिता ने भी मान लिया कि मक्खन की गा़ड़ी गैरेज में ही जाकर पार्क होगी...सो अब हमारा मक्खन गैरेज चलाता है...आज तो सिर्फ मक्खन का परिचय दे रहा हूं...उसके किस्से आपको आगे स्लॉग ओवर में सुनने को मिलते रहेंगे...मक्खन की अक्सर बड़ी मासूम सी समस्याएं होती हैं...जैसे कि कोई फॉर्म ओनली कैपिटल में भरना हो तो मक्खन पूछता है... फॉर्म क्या दिल्ली जाकर भरना होगा...मक्खन बेचारा दिल्ली का एसटीडी कोड (011) भी नहीं मिला पाता...क्यों नहीं मिला पाता...मक्खन जी को फोन पर 0 का बटन तो मिल जाता है 11 का बटन कहीं ढूंढे से भी नहीं मिलता...मक्खन को कहीं फैक्स करना हो तो कहता है कि इस पर पोस्टल स्टैम्प लगा दूं...रास्ते में कहीं खोने का रिस्क नहीं रहेगा...ऐसा है हमारा मक्खन...
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बिड़लाजी से ज़्यादा कमा कर दिखा दूं

दो स्कूल-मास्टर साइकिल से बातें करते हुए स्कूल से घर लौट रहे थे. रास्ते में बिड़लाजी की फैकट्री भी आती थी. एक मास्टर रोज बड़ी हसरत भरी नज़र से बिड़लाजी की फैक्ट्री को देखता और फिर ठंडी सांस लेता और घर की राह पकड़ लेता..एक दिन दूसरे मास्टर से रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिया, क्यों भाई माज़रा क्या है..ये तू बिड़लाजी की फैक्ट्री को रोज़ ऐसे क्यों देखता है...ये सुनकर पहला मास्टर बोला...यार तुझे क्या बताऊं..अगर ऊपर वाला मुझे बिड़लाजी की सारी फैक्ट्रियां दे दे, सारा बिज़नेस दे दे तो मैं बिड़लाजी से ज़्यादा कमा कर दिखा दूं...इस पर साथी मास्टर ने मखौल के अंदाज़ में कहा...भई ये कैसे हो सकता है...तूने बहुत तीर भी मारा तो बिड़लाजी जितना ही कमाएगा, भला ज़्यादा कैसे कमा लेगा...इस पर पहला मास्टर तपाक से बोला...क्यों साथ दो ट्यूशन नहीं करूंगा...
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क्या आपके पास ये सब है...

क्या आपके पास ये सब है-

टूटता जिस्म...
नशीली आखें...
कपकपाते होंठ...
सिमटी हुई आवाज़...
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इंतजार किस बात का कर रहे हैं, जनाब....डॉक्टर के पास जाइए, आपको स्वाइन फ्लू है...
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सेब की ताकत

क्लास में टीचर बच्चों को फास्टफूड की जगह रिच डाइट लेने की नसीहत दे रही थीं...सेब जैसे फलों के फायदे बता रही थीं...तभी एक नन्हे बाल-गोपाल ने मासूमियत से पूछा...टीचर-टीचर क्या सेब में बहुत ताकत होती है...टीचर बोलीं- हां, बेटे बहुत ताकत होती हैं....बच्चा फिर बोला...बहुत बहुत ज़्यादा ताकत होती है...टीचर ने जवाब दिया...हां भई बहुत बहुत ज़्यादा ताकत होती है....बच्चा- क्या हमसे भी ज़्यादा ताकत होती है....अब टीचर ने थोड़ा अचकचाते हुए कहा...हां बाबा हां, हमसे भी ज्यादा ताकत होती है....बच्चा....टीचर....जब सेब में हमसे भी ज़्यादा ताकत होती है तो फिर वो हमें क्यों नहीं खा जाता...
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