खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से पेन-कम्प्यूटर तोड़ रहा है

वक्त-वक्त की बात है...खुशदीप

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  • Khushdeep Sehgal
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  • मैं घर में बैठा था कि मक्खन बड़े उखड़े अंदाज़ में मेरे पास आया...चेहरे से दुनिया-जहां का दर्द टपक रहा था...आते ही बोला...ओफ्फो...सात साल में कितनी दुनिया बदल गई...


    मक्खन को दार्शनिक की तरह बात करते देख मेरा माथा ठनका...मैंने पूछा...ऐसा क्या हो गया मक्खन प्यारे...

    मक्खन...क्या हो गया....ये पूछो कि क्या नहीं हो गया...

    मैंने कहा...जब बताओगे, तब तो मुझे पता चलेगा कि कौन सा आसमान टूट पड़ा...

    मक्खन... अब क्या बताऊं दोस्त...सात साल पहले मैं घर आता था तो मेरी मक्खनी दरवाजे से घुसते ही किस से मेरा वेलकम करती थी और मेरा पपी मुझ पर गुर्राता था...


    इसके बाद मक्खन ने ठंडी सांस ली चुप हो कर बैठ गया..

    तब तक मेरी जिज्ञासा भी बढ़ गई, मैंने कहा...तो अब ऐसा क्या हो गया...

    मक्खन...अब उन दोनों ने रोल बदल लिए हैं...

    6 टिप्पणियाँ:

    Shah Nawaz ने कहा…

    ग़ज़ब!

    निर्मला कपिला ने कहा…

    बहुत खूब्!

    रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

    "अब उन दोनों ने रोल बदल लिए हैं..."
    मक्खन के बहाने आज के परिवेश पर व्यंग्य, मजा आ गया !
    बहुत बढ़िया,

    दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

    ये तो होना ही था।

    sagebob ने कहा…

    वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है.
    बढ़िया कृति.
    सलाम

    Atul Shrivastava ने कहा…

    वाह। समय के साथ पपी और मख्‍खनी ने अपने रोल बदल दिए। बदलना ही था। वक्‍त वक्‍त की बात है।

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