खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से पेन-कम्प्यूटर तोड़ रहा है

मक्खन की बेबे (मां) गुम हो गई...Khushdeep

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  • Khushdeep Sehgal
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  • मक्खन की बेबे (मां) की मौत हो गई...भाईया जी (पिता) पहले ही दुनिया छोड़ कर जा चुके थे...मक्खन का बेबे से बड़ा जुड़ाव था...बेबे के बिना उसे दुनिया ही बेकार लगने लगी...अपने में ही गुमसुम रहने लगा...इसी तरह एक साल बीत गया...मक्खन के जिगरी ढक्कन से मक्खन की ये हालत देखी नहीं जा रही थी...लेकिन करे तो करे भी क्या...

    तभी उसे किसी ने बताया कि शहर में कोई सयाना आया हुआ है...ढक्कन ने सोचा मक्खन को सयाने जी के पास ही ले जाता हूं...शायद वो ही उसे ठीक कर दें...मक्खन ने सयाने को अपना दर्द बताया...सयाना भी पहुंची हुई चीज़ था...उसने मक्खन को ठीक करने के लिए एक तरकीब सोची...उसने मक्खन से कहा...बच्चा, तेरी बेबे से पिछले जन्म में अनजाने में कोई बड़ी भूल हो गई थी...इसलिए ऊपर वाले ने बेबे को सजा के तौर पर इस जन्म में श्वान (कुत्ती) बना कर भेज दिया है...लेकिन जल्द ही तेरी बेबे से मुलाकात होगी...इसलिए परेशान मत हो...मक्खन सुन कर मायूस तो बड़ा हुआ लेकिन बेबे से जल्द मिलने की सोच कर ही थोड़ी तसल्ली हुई...बाहर निकले तो ढक्कन उसे खुश करने के लिए जलेबी की दुकान पर ले गया...दोनों जलेबी खा ही रहे थे कि एक कुत्ती वहां आ गई... और जलेबी के लालच में मक्खन को देख कर ज़ोर ज़ोर से पूंछ हिलाने लगी...मक्खन का कुत्ती को देखकर माथा टनका...सयाने जी के बेबे के बारे में बताए शब्द उसके कानों में गूंजने लगे...मक्खन ने जलेबी का एक टुकड़ा डाल दिया...कुत्ती ने झट से टुकड़ा चट कर लिया...और उचक-उचक कर मक्खन की टांगों पर पंजे मारने लगी...मक्खन ने सोचा हो न हो...ये मेरी बेबे ही लगती है...

    मक्खन घर की ओर चला तो कुत्ती जी (सॉरी...बेबे) पीछे पीछे...मक्खन का भी मातृसेवा का भाव अब तक पूरी तरह जाग चुका था...बेबे को साथ लेकर ही मक्खन अपने घर में दाखिल हुआ और मक्खनी को आवाज़ दी...सुन ले भई...तूने बेबे को पहले बड़ा दुख दिया था...लेकिन इस बार बेबे जी को कोई तकलीफ हुई तो तेरी खैर नहीं...मक्खनी भी मक्खन के गुस्से की सोच कर डर गई...लो जी बेबे जी की तो अब मौज आ गई...कहां गली-गली नालियों में मुंह मारते फिरना...और कहां एसी वाला बढ़िया बेडरूम...बेबे जी के लिए बढ़िया बेड बिछ गया...बेड पर पसरे रहते और बढ़िया से बढ़िया खाना वहीं आ जाता...
     
    मक्खन भी काम पर आते-जाते बेबे जी के कमरे में जाकर मिलना नहीं भूलता...एक दिन मक्खन काम से घर वापस आया तो आदत के मुताबिक बेबे जी के कमरे में गया...लेकिन ये क्या...बेड पर उसे बेबे जी नहीं दिखे....ये देखते ही मक्खन का पारा सातवें आसमान पर...चिल्ला कर मक्खनी को आवाज़ दी....बेबे जी कहां हैं...तूने फिर कोई उलटी सीधी हरकत की होगी...और वो नाराज़ होकर चली गई होंगी...इस पर मक्खनी ने कहा....नाराज़ न होओ जी...ओ आज शामी बेबे जी नू घुमाण लई भाईया जी आ गए सी, ओन्हा नाल ही सैर ते गए ने...(आज शाम को बेबे जी को घुमाने के लिए भाईया जी आ गए थे...उन्हीं के साथ सैर पर गई हैं...)

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    10 टिप्पणियाँ:

    SKT ने कहा…

    हा..हा..हा...बढ़िया लगा बेबे का अवतरण!...मगर ढक्कन इतना भी ढक्कन नहीं था.

    निर्मला कपिला ने कहा…

    बहुत बढिया क्या कहने मक्खन के और बाबा के। शुभकामनायें।

    Rakesh Kumar ने कहा…

    क्या ऐसा भी होता है मक्खन इतनी सेवा करे बेबे की ,धन्य है मक्खन की बेबे
    भक्ति की .

    Shah Nawaz ने कहा…

    :-)

    सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

    waah kya baat hai! ! !

    Udan Tashtari ने कहा…

    हा हा! :)

    Patali-The-Village ने कहा…

    धन्य है मक्खन, धन्य है मक्खन की बेबे भक्ति|

    Rakesh Kumar ने कहा…

    अब क्या होगा खुशदीप भाई जब मक्खन की बेबे भाईया जीके साथ मक्खन के और भाई बहिन भी ले आएगी.

    किलर झपाटा ने कहा…
    इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
    किलर झपाटा ने कहा…

    This post has been removed by a blog administrator.

    बहुत रंज हुआ खुशदीप जी, आपके इस काम से।

    बहुत बहुत धन्यवाद।

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