खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से पेन-कम्प्यूटर तोड़ रहा है

गर्लफ्रैंड की मक्खन से डिमांड...खुशदीप






मक्खन से गर्लफ्रैंड ने आइसक्रीम खिलाने की डिमांड की..................................................

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मक्खन आइसक्रीम खरीद लाया...

गर्लफ्रैंड ने कहा...थैंक यू...

मक्खन...सिर्फ थैंक यू...

गर्लफ्रैंड...मुझे पता है तुम क्या चाहते हो...किस न...

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मक्खन...चुप कर भूखी...जल्दी से आधी आइसक्रीम मुझे दे...

2 टिप्पणियाँ:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

ख़ुशदीप जी ! जो बात आपने लतीफ़े में कही है वह एक हक़ीक़त है। नादान लोग इन पर केवल हंस कर रह जाते हैं लेकिन जो दानां होते वे कोशिश करते हैं लतीफ़े के ज़रिये जिस समस्या को सामने लाया गया है, उसका हल कैसे निकाला जाए ?
हम दोनों टाइम खाने के साथ सुबह शाम नाश्ता करने वाले लोग जो सुबह शाम टेबिल टेनिस और तीरंदाज़ी करते रहते हैं, भूखों की तड़प को भला कैसे समझ सकते हैं ?
किसी का दर्द भी हमें तो उसकी कमअक्ली ही लगेगी।
भूखे पेट तो प्रभु का भजन भी नहीं होता।
भूखे को औरत में माशूक़ नज़र नहीं आती।
इसीलिए महात्मा बुद्ध ने नदी किनारे जिस सत्य को सबसे पहले पहचाना था वह था रोटी का सत्य।
हमें आराम से मिल रही है तो हमें क्या मालूम ?

इतनी गंभीर बात से आपके लतीफ़े का मज़ा यक़ीनन ख़राब हुआ होगा लेकिन इसके लिए नो सॉरी !
इसी तरह से एक भूख प्यार की भी होती है।
बहनें जो तरसती हैं कि अपने मायके जाने का अवसर कब मिले ?
रक्षाबंधन उन्हें यही अवसर देता है।

एक सुरक्षित समाज का निर्माण ही हम सब भाईयों की ज़िम्मेदारी है
बहनों की रक्षा से भी कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

इसके बाद हम यह कहना चाहेंगे कि भारत त्यौहारों का देश है और हरेक त्यौहार की बुनियाद में आपसी प्यार, सद्भावना और सामाजिक सहयोग की भावना ज़रूर मिलेगी। बाद में लोग अपने पैसे का प्रदर्शन शुरू कर देते हैं तो त्यौहार की असल तालीम और उसका असल जज़्बा दब जाता है और आडंबर प्रधान हो जाता है। इसके बावजूद भी ज्ञानियों की नज़र से हक़ीक़त कभी पोशीदा नहीं हो सकती।
ब्लॉगिंग के माध्यम से हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि मनोरंजन के साथ साथ हक़ीक़त आम लोगों के सामने भी आती रहे ताकि हरेक समुदाय के अच्छे लोग एक साथ और एक राय हो जाएं उन बातों पर जो सभी के दरम्यान साझा हैं।
इसी के बल पर हम एक बेहतर समाज बना सकते हैं और इसके लिए हमें किसी से कोई भी युद्ध नहीं करना है। आज भारत हो या विश्व, उसकी बेहतरी किसी युद्ध में नहीं है बल्कि बौद्धिक रूप से जागरूक होने में है।
हमारी शांति, हमारा विकास और हमारी सुरक्षा आपस में एक दूसरे पर शक करने में नहीं है बल्कि एक दूसरे पर विश्वास करने में है।
राखी का त्यौहार भाई के प्रति बहन के इसी विश्वास को दर्शाता है।
भाई को भी अपनी बहन पर विश्वास होता है कि वह भी अपने भाई के विश्वास को भंग करने वाला कोई काम नहीं करेगी।
यह विश्वास ही हमारी पूंजी है।
यही विश्वास इंसान को इंसान से और इंसान को ख़ुदा से, ईश्वर से जोड़ता है।
जो तोड़ता है वह शैतान है। यही उसकी पहचान है। त्यौहारों के रूप को विकृत करना भी इसी का काम है। शैतान दिमाग़ लोग त्यौहारों को आडंबर में इसीलिए बदल देते हैं ताकि सभी लोग आपस में ढंग से जुड़ न पाएं क्योंकि जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उसी दिन ज़मीन से शैतानियत का राज ख़त्म हो जाएगा।
इसी शैतान से बहनों को ख़तरा होता है और ये राक्षस और शैतान अपने विचार और कर्म से होते हैं लेकिन शक्ल-सूरत से इंसान ही होते हैं।
राखी का त्यौहार हमें याद दिलाता है कि हमारे दरम्यान ऐसे शैतान भी मौजूद हैं जिनसे हमारी बहनों की मर्यादा को ख़तरा है।
बहनों के लिए एक सुरक्षित समाज का निर्माण ही हम सब भाईयों की असल ज़िम्मेदारी है, हम सभी भाईयों की, हम चाहे किसी भी वर्ग से क्यों न हों ?
हुमायूं और रानी कर्मावती का क़िस्सा हमें यही याद दिलाता है।

रक्षाबंधन के पर्व पर बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं...

देखिये
हुमायूं और रानी कर्मावती का क़िस्सा और राखी का मर्म

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आप ब्लॉगर्स मीट वीकली में आए इसके लिए आपका शुक्रिया !

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