खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से पेन-कम्प्यूटर तोड़ रहा है

मक्खन द ग्रेट सेल्समैन...खुशदीप

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  • Khushdeep Sehgal
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  • मक्खियां मारते मारते मक्खन आजिज आ गया...सोचा कहीं नौकरी कर ली जाए...लेकिन मक्खन को नौकरी देता कौन...मक्खन ने अपना जैसा ही मुफलिस दुकानदार ढूंढ लिया...दुकान के बारह बजे हुए थे लेकिन उसका मालिक खुद को सेठ कहलाना ही पसंद करता था...दुकान पर ज़्यादा सामान तो कुछ था नहीं...ग्राहक जो मांगते वो मुश्किल से ही दुकान पर निकलता...अब ऐसे में मक्खन को ज़्यादातर ग्राहकों को खाली हाथ ही लौटाना पड़ता...



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    एक दो दिन कंगाल सेठ ये देखता रहा...फिर उसने मक्खन को बुला कर समझाया...अच्छा सेल्समैन वो होता है जो ग्राहक को ज़रूरत हो या न हो कुछ न कुछ बेच ही देता है...खाली हाथ दुकान से नहीं लौटने देता...

    मक्खन ने सेठ की ये नसीहत गिरह से बांध ली...और ग्राहक का इंतज़ार करने लगा...मुश्किल से एक ग्राहक आया...

    ग्राहक...क्या टॉयलेट पेपर मिलेंगे...

    मक्खन....टॉयलेट पेपर तो आज ही खत्म हुए हैं...लेकिन मेरे पास उससे भी बेहतर चीज़ है...दे दूं क्या...

    ग्राहक....वो क्या है भला...

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    मक्खन.... रेगमार (Sand-Paper)

    1 टिप्पणियाँ:

    DR. ANWER JAMAL ने कहा…

    आपकी रचना अच्छी है।
    बुख़ारी साहब का बयान इस्लाम के खि़लाफ़ है
    दिल्ली का बुख़ारी ख़ानदान जामा मस्जिद में नमाज़ पढ़ाता है। नमाज़ अदा करना अच्छी बात है लेकिन नमाज़ सिखाती है ख़ुदा के सामने झुक जाना और लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना।
    पहले सीनियर बुख़ारी और अब उनके सुपुत्र जी ऐसी बातें कहते हैं जिनसे लोग अगर पहले से भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों तो वे आपस में ही सिर टकराने लगें। इस्लाम के मर्कज़ मस्जिद से जुड़े होने के बाद लोग उनकी बात को भी इस्लामी ही समझने लगते हैं जबकि उनकी बात इस्लाम की शिक्षा के सरासर खि़लाफ़ है और ऐसा वह निजी हित के लिए करते हैं। यह पहले से ही हरेक उस आदमी को पता है जो इस्लाम को जानता है।
    लोगों को इस्लाम का पता हो तो इस तरह के भटके हुए लोग क़ौम और बिरादराने वतन को गुमराह नहीं कर पाएंगे।
    अन्ना एक अच्छी मुहिम लेकर चल रहे हैं और हम उनके साथ हैं। हम चाहते हैं कि परिवर्तन चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो लेकिन होना चाहिए।
    हम कितनी ही कम देर के लिए क्यों न सही लेकिन मिलकर साथ चलना चाहिए।
    हम सबका भला इसी में है और जो लोग इसे होते नहीं देखना चाहते वे न हिंदुओं का भला चाहते हैं और न ही मुसलमानों का।
    इस तरह के मौक़ों पर ही यह बात पता चलती है कि धर्म की गद्दी पर वे लोग विराजमान हैं जो हमारे सांसदों की ही तरह भ्रष्ट हैं। आश्रमों के साथ मस्जिद और मदरसों में भी भ्रष्टाचार फैलाकर ये लोग बहुत बड़ा पाप कर रहे हैं।
    ये सारे भ्रष्टाचारी एक दूसरे के सगे हैं और एक दूसरे को मदद भी देते हैं।
    अहमद बुख़ारी साहब के बयान से यही बात ज़ाहिर होती है।
    ब्लॉगर्स मीट वीकली 5 में देखिए आपसी स्नेह और प्यार का माहौल।
    शुक्रिया !
    जन्माष्टमी की शुभकामनाएं !
    आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

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