खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से पेन-कम्प्यूटर तोड़ रहा है

मक्खन की दीवाली...खुशदीप

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  • Khushdeep Sehgal
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  • मक्खनी मक्खन से... क्या जी आपने बोला था कि बिना रीज़न दारू को हाथ भी नहीं लगाऊंगा...फिर
    आज कौन सी ऐसी वजह है जो बोतल खोले बैठे हो..................................................

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    मक्खन... भागवान तू रही भोली की भोली...इतना भी नहीं समझ पाई...दीवाली सर पे आ गई है...

    मक्खनी... तो...

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    मक्खन...राकेट छोड़ने के लिए वक्त पर बोतल किससे मांगता फिरूंगा...


    10 टिप्पणियाँ:

    दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

    रीजन ठीक है।

    Udan Tashtari ने कहा…

    सही तो कारण है...उसी चक्कर में हमें आज खोलनी पड़ गई....:)

    Udan Tashtari ने कहा…

    एक पड़ोसी को भी चाहिये...उसे भी राकेट छोड़ने का मन हुआ है...हद है..किस किस को निभाऊँ???

    Sunil Kumar ने कहा…

    सही जबाब :)

    अजय कुमार झा ने कहा…

    हा हा हा हा जभी हम कहें कि दीवाली पर बोतल की डिमांड इत्ती क्यों बढ जाती है

    रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

    हा हा हा हा कारण ठीक है।

    Ritu ने कहा…

    क्‍या बात है जी... रीजन तो बनता है दारू पीने का

    हिन्‍दी कॉमेडी- चैटिंग के साइड इफेक्‍ट

    Geeta ने कहा…

    ha ha ha haa , boht badiya,

    Rajesh Kumari ने कहा…

    bahut manoranjak post hai.pahli baar aapke blog par aai hoon.

    Yashwant Mathur ने कहा…

    :))))

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